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Veer Hemraj

यह गणतंत्र दिनः शहीद हेमराज के नाम

घनश्याम ठक्कर

अपनी आझादीको हम हरगिज़ मिटा सकते नही
सर कटा सकते है लेकिन सर झुका सकते नहीं
-शकिल बदायुनी


अय मेरे वतन के लोगों, जरा आंख में भर लो पानी,
जो शहीद हुए हैं उनकी जरा याद करो कुरबानी.
-प्रदीपजी

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अय मेरे वतन के लोगो

Music Remix: Oasis Thacker

आजादी को पाना जितना कठिन है, उतना ही कठिन है उस को बनाये रखना. वीर हेमराज जैसे सिपाही की कुरबानी की वजहसे हम सुख और शान्ति से जी सकते हैं. सिर्फ शहीद हेमराज ही नहीं, उनकी पत्नी और परिवार भी देश के सम्मान के लिए जान कुरबान करने को तैयार हो गये. युध्ध का समय हो या शान्ति का, हमारे बहादुर जवान बर्फीले तापमान में और तूफानी मौसम में कठिन प्रशिक्षण करते रहते हैं. इतना ही नहीं, कुदरती आफतों में मदद करने के लिये जो भी हुनर सीखने होते है, सीखते है, और अपनी जान की बाजी लगाकर लोगों को बचाते है.
मैं जब एन्जिनियरिंग कोलेजमें था, तब मुझे नेवल ओफिसर के लिये इन्टरव्यू के लिये चुना गया था. यह कोई ओफिस का पंद्रह मिनिट का इन्टरव्यू नहीं था. अहमदाबाद से मीरत गये. वहां चार दिन लगातार, सुबह के पांच बजे से ले कर रात को आठ बजे तक मेथ, सायन्स, सामान्य ज्ञान, और बहुत कठिन फिझिकल टेस्ट पास करने थे. रोप-क्लाइम्बिंग के टेस्ट के दौरान मेरा हाथ फिसल गया. मेरी हथेलियों जख्मी हुई और में बाकी की परीक्षाए न दे सका. लेकिन उन तीन-चार दिन में मैने मेहनत, शीस्त, और देशप्रेम और गर्व के जो सबक सीखे, वो मुझे पूरे जीवन के दौरान सहायक हुए.
दो साल पहले, अमरिका में बहुत साल गुजारने के बाद जब रिटायर्ड होने को सोचा, तो वतन के नोस्टेल्जिया ने ललकारा. सोचा, जिस देशने मुझे इंजीनियर बनने की शिक्षा दी, कवि और संगीतकार बनने के संस्कार दिये, वहां जा कर रिटायर्ड हो कर, देश के कुछ काम आउं. साहित्य और संगीत की सेवा करते करते, दो पैसे की बचत को भारत में खर्च करुं तो जन्मभूमि का कर्ज चुकाने का संतोष मिलेगा. लेकिन यहां आने के बाद जो अनुभव हुए, वे बहुत निराशाजनक थे. लगा कि देश के लिये कुरबानी की कहानी लश्कर के कॅम्प से आगे नहीं जाती है. वैसे तो देशने पीछले कुछ सालों में बहुत आर्थिक प्रगति की है. मैंने देश छोडा तब जो सुविधाएं सिर्फ धनिको को प्राप्त हो सकती थी, वे आज मध्यमवर्ग के लोग, और कुछ गरीब भी भुगत रहे हैं. लेकिन लोभ और बेइमानी की कोई सीमा नहीं है. सैनिक की तरह कुरबानी करने की बात ही क्या करे? अनैतिकता अब बहुमति को स्वीकार्य हो गई है. रिश्वत देना-लेना जीवनधर्म बन गया है. कुरबानी की बात तो एक और रही, स्वार्थ और लोभ की कोई सीमा नहीं है. नैतिकता की सूची में भारत दुनिया के सबसे गरीब देश के नीचे है. सरकारी कर्मचारी हो या पोलिटिशियन, छोटा व्यापारी हो या बडा उद्योगपति, सब को दूसरों की मेहनत के जरिये रातों - रात धनी बन जाना है, और फिर देशभक्ति और कुरबानी के नारे लगाने है. हररोज तथाकथित वफादार नौकर और सुरक्षा गार्ड की मदद से ही चोरी और खून होते हैं. 'मेरा भारत महान' यह सिर्फ माल-ट्रक के पीछे लिखने के स्लोगन के सिवा कुछ नहीं है. जैसे सरहद की सुरक्षा की जिम्मेदारी सेना पर है, आंतरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी पुलिस विभाग के पास है. लेकिन हम पुलिस विभाग की तुलना सेना से कर सकते है? अगर पुलिस विभाग सेना जैसी निष्ठा से काम करता, तो इतने गुनाह नहीं होते.

यह गणतंत्र दिन आतिशबाजी कर के जश्न मनाने का नहीं है. यह गणतंत्र दिन वीर श्हीद हेमराज की कुरबानी को, उन के कुटुंब की कुरबानी को याद कर के प्रामाणिक देशभक्त बनने का है.  

 

 

 

 

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